भारत की स्वतंत्रता के बाद से, देश ने अपने विधिक ढांचे में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखे हैं। ब्रिटिश शासन की विरासत से छुटकारा पाते हुए, भारत ने एक स्वतंत्र और समावेशी न्यायिक प्रणाली विकसित करने का प्रयास किया है।
कुछ प्रमुख घटनाक्रम:
संविधान का निर्माण: 1950 में लागू हुए भारतीय संविधान ने देश को एक लोकतांत्रिक और गणतंत्रीय राष्ट्र बनाया। संविधान में मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं का प्रावधान किया गया है, जो न्यायिक समीक्षा के माध्यम से संरक्षित हैं।
न्यायिक सुधार: स्वतंत्रता के बाद से, न्यायिक प्रणाली में सुधार के लिए कई प्रयास किए गए हैं। इनमें न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार, न्यायालयों का आधुनिकीकरण और न्यायिक देरी को कम करने के उपाय शामिल हैं।
सामाजिक न्याय: न्यायिक प्रणाली ने सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कई महत्वपूर्ण फैसलों ने दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और अन्य वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा की है।
मानवाधिकारों की रक्षा: भारत में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए एक मजबूत संवैधानिक और न्यायिक ढांचा मौजूद है। उच्चतम न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण फैसलों के माध्यम से मानवाधिकारों की रक्षा की है।
चुनौतियां:
न्यायिक देरी: न्यायिक प्रणाली में लंबित मामलों की संख्या एक बड़ी चुनौती है।
न्यायिक सुधारों का धीमा क्रियान्वयन: न्यायिक सुधारों का क्रियान्वयन धीमी गति से हो रहा है।
न्याय तक पहुंच: सभी नागरिकों तक समान रूप से न्याय की पहुंच सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है।


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